मैं सीता आज सभी प्रबुद्ध जनों
से बात करना चाहती हूँ , मैं देख रही हूँ कि राम नवमी हो
या विजयादशमी भारत भूमि के तथाकथित बुद्धिजीवी मेरी दी गयी अग्निपरीक्षा पर प्रश्न
करते हैं और स्त्री सम्मान पर प्रश्न चिन्ह लगते हुए मेरे पति श्री राम के साथ
पूरे हिन्दू धर्म की आस्था में हास्य रस ढूंढते हुए आस्थावान हिन्दुओं की खिल्ली
उड़ाते हैं मुझे हंसी आती है ये काम पुरुष ही अधिक करते हैं....
मेरे पति श्री राम जिन्हें मैं स्नेहवश प्रभु कह
के भी पुकारती हूँ,उनके और मेरे बीच के प्रेम की पराकाष्ठा समझने के
लिए ह्रदय में प्रेम होना चाहिए न कि मस्तिष्क में कुटिलता... कुटिलता श्री
राम भक्तों के प्रेम की खिल्ली उड़ाने की,कुटिलता स्त्री अधिकारों के
प्रति स्वयं को जागरूक दिखाने की,कुटिलता स्वयं को सबसे अधिक बुद्धिमान सिद्ध करने
की और कुटिलता इस सम्पूर्ण जगत को ईश्वर रहित दिखाने की.........
श्री राम ने सदा न सिर्फ
मेरे अधिकारों की बल्कि मेरी भावनाओं और मेरे प्रेम को सर्वोच्च स्थान दिया परन्तु
उससे भी अधिक सर्वोच्च थी उनकी राज्य और उसकी प्रजा के प्रति आस्था और यही आस्था
मुझे उनसे सदा और अधिक प्रेम करने के लिए विवश करती,मेरे लिए भी एक स्त्री की
कोमल भावनाओ का सम्मान करने से अधिक महत्वपूर्ण राष्ट्र रहा बात बात पर नारीमुक्ति
और नारी सम्मान का झंडा हम सदा उठाते रहें तो राष्ट्र के प्रति कब अपनी भूमिका और
कर्तव्यनिष्ठा समझेंगे? प्रत्येक अधिकार के लिए लड़ने या उसे प्राप्त करने
से पहले क्या ये आकलन नहीं होना चाहिए कि हमने अपने कर्त्तव्य पूरी निष्ठां से
निभाए या नहीं?
अब बात पहले मेरी स्थिति पर
जिस पर तथाकथित बुद्धिजीवी पुरुषों और नारी मुक्ति आन्दोलन की पुरोधा स्त्रियों को
अत्यधिक चिंता और सुहानुभूति है........
आप लोगों का एक प्रश्न है
सूर्पनखा ने तो सिर्फ प्रणय निवेदन भर किया था उसकी नाक कान क्यों कटे गए? वह जब प्रणय प्रस्ताव ले कर श्री राम के पास गयी तो श्री राम ने उसे
मना किया उन्होंने कहा कि वे विवाहित हैं और अपनी पत्नी से प्रेम करते हैं पर उसे
प्रत्येक कीमत पर श्री राम चाहिए थे क्या ऐसी स्त्री जो एक पुरुष के बार बार मना
करने पर भी उसके साथ जबरदस्ती प्रेम सम्बन्ध बनाना चाहे आप लोग अपनी आजकल की भाषा
में चरित्रहीन नहीं कहते? क्या वह सम्बन्ध अवैध सम्बन्ध नहीं होता? और यदि श्री राम ये सम्बन्ध स्वीकार कर भी लेते तो क्या तब आप उन पर
दुश्चरित्र होने का आरोप नहीं मढ़ते? वे बार बार मना करते
रहे पर उस दुराग्रही स्त्री ने अपना हठ नहीं त्यागा. क्या किसी स्त्री को अपने भाई
का परिवार बिगाड़ने का प्रयास करते देख कर किसी भाई को क्रोध आना स्वाभाविक नहीं था
? क्या एक स्त्री होकर भी वह मेरा परिवार तोड़ने का प्रयास
नहीं कर रही थी ? क्या ऐसे कार्य अब क्षमा योग्य कर दिए गए हैं ? क्या ऐसी स्त्रियों के लिए दंड प्रावधान ख़त्म कर दिए गए हैं ? अवैध सम्बन्ध कितने ही अपराधों का कारण बनते हैं ऐसे दुराग्रह पर बार
बार मना करने पर भी यदि मेरे छोटे भाई जैसे लक्ष्मण का रुधिर खौला और उसने क्रोधवश
सूर्पनखा को दंड दिया तो यह अपनी बहन और माँ सामान भाभी के घर और गृहस्थी को बचाने
का प्रयास नहीं माना जायेगा ?
क्या ये मेरी भावनाओं और
प्रेम की रक्षा के लिए उठाया गया कदम नहीं था ? आपके न मानने से मुझे
कोई अंतर नहीं पड़ता परन्तु मैं इसके लिए लक्ष्मण की आभारी हूँ कि उन्होंने मेरे
प्रेम और परिवार की रक्षा की.
अब दूसरा प्रश्न कि रावण ने
मुझे हाथ भी नहीं लगाया तो उसकी हत्या क्यों? उसे बलात्कारी क्यों कहा
जाए? आपके लिए संभवतः बलात्कार सिर्फ बलपूर्वक शारीरिक
सम्बन्ध बनाना भर है परन्तु जब वह मुझे बलपूर्वक और छलपूर्वक मुझे मेरे पति से अलग
करके मुझे अपने राज्य में ले जा रहा था तब मैं रोती रही, बिलखती रही पर उस पाषाण ह्रदय पर इसका कोई प्रभाव न पड़ा
और आपमें से कुछ कहते हैं कि उसने अपनी बहन के सम्मान के लिए ये किया? अपनी भाभी के सम्मान के लिए स्वयं अपराधी को लक्षमण का दंड देना गलत
और अपनी बहन के अपमान के लिए श्री राम का सामना न करके मुझ अकेली स्त्री का अपहरण
सही ? और वह भी तब जबकि मैं अपराधी भी नहीं
थी.......अर्थात कुछ क्रूर कबीलाई जातियों के स्त्री के बदले स्त्री कानून के
समर्थक हैं आप?
आखिर एक
महाबली और जैसा कि आप कहते हैं सच्चरित्र और एक बलशाली सेना से युक्त एक महा
बुद्धिमान राजा को वन में रहने वाले निहत्थे दो भाइयों से किस बात का भय था कि
उसने श्री राम का सीधा सामना करने का साहस नहीं दिखाया ? इतने सच्चरित्र व्यक्ति का एक
अकेली महिला का अपहरण करने में क्या चरित्र था ??
एक स्त्री
जिसने अपने पति से अलग राजमहलों के सुख भोगने के स्थान पर अपने पति के साथ अपने
जीवनसाथी के साथ जंगलों के असाध्य कष्ट चुने थे उसे उसके पति से अलग करके उसने
मुझे जो भयंकर वेदना दी उसमे तुम लोगों को मेरे साथ अन्याय नहीं दिखा ? अरे! मेरे पति के प्रति मेरे
प्रेम में ही तो मेरा स्त्रीत्व था उसे छिन्न भिन्न करके उसने मेरे साथ बलात्कार
ही किया था ! एक बार नहीं जितने दिन मैं अशोक वाटिका में रही उस प्रत्येक दिन उसने
मेरे साथ मानसिक बलात्कार किया जिसके लिए मैं उसे क्षमा नहीं कर सकती थी,मेरे इस संत्रास का मेरे पति को
पूरा अंदाज़ा था मेरे साथ न रहने पर मेरे लिए वे व्याकुल थे पर इससे अधिक उन्हें
पीड़ा थी कि मैं अकेली थी. सिर्फ मेरे लिए मेरे पति न सिर्फ जंगल जंगल भटके बल्कि
अपने सीमित संसाधनों में उन्होंने उस महाबली रावण से युद्ध करने का साहस किया,ये मेरे प्रति उनके प्रेम की
पराकाष्ठा थी जो तुम जैसे स्वयं को बुद्धिमान कहलाये जाने के आतुर लोगों को नहीं
दिख सकती दम्भियों ! रावण मुझे अशोक वाटिका में हाथ नहीं लगा सका तो इसके पीछे
उसकी पत्नी मंदोदरी का भी साहस था जिसने न्याय के लिए अपने पति के अन्याय के समक्ष
चुनौती प्रस्तुत की,और वह विभीषण था जिसके लिए एक
महिला का चरित्र सर्वोपरि था.भाई द्रोह का आरोपी बन कर भी उसने एक महिला के सम्मान
के लिए अपने शक्तिशाली भाई से बैर लेने का साहस दिखाया? विभीषण के द्रोह का जिन्हें कष्ट
है उन्हें उस द्रोह का कष्ट नहीं जो रावण ने अपने भाई को सभी धन धान्य और उसके
हिस्से से अलग करके विभीषण के साथ किया ? और ये कार्य तो उसने पहले ही कर लिया था न? मेरे आने से पहले ! ये अन्याय
नहीं था ?
अब सबसे अधिक पुछा जाने
वाला प्रश्न कि मैंने अग्निपरीक्षा क्यों दी ? तब जबकि स्त्रियाँ स्वयंवर
के माध्यम से अपना पति चुनने के लिए स्वतंत्र थीं तब मुझ पर कौन सा दबाव होगा कि
मैंने अग्नि परीक्षा दी?
श्री राम ने मुझसे
अग्निपरीक्षा देने का आग्रह किया ताकि कोई मेरे चरित्र पर आक्षेप न लगा सके, और मैं किसी और मानसिक यंत्रणा से न निकलूँ. यदि उन्हें मेरे चरित्र
पर लेश मात्र भी संदेह होता तो वह बेमतलब इतनी मेहनत नहीं करते इतने कष्ट नहीं
सहते. उस समय उनके पास भी विकल्प था वे किसी भी दूसरी स्त्री से विवाह करते और
मुझे मेरे हाल पर छोड़ सकते थे परन्तु उन्होंने स्वयं को मेरे अतिरिक्त कोई विकल्प
नहीं दिया,उन्होंने मुझसे अग्नि परीक्षा का आग्रह अपने संदेह
को मिटने के लिए नहीं उस जनमानस के संदेह के लिए किया जो हर हाल में एक महिला को
ही दोषी ठहराता है पर वे संभवतः नहीं समझ पाए कि संसार में कुछ जीव ऐसे भी होते
हैं जो मात्र आलोचना के लिए ही जन्म लेते हैं वे उस तत्कालीन परिस्थिति में चाहे
जो भी निर्णय लेते भविष्य के गर्भ में उनके लिए आलोचनाएँ ही थी. उन्होंने अग्नि
परीक्षा का आग्रह इसलिए भी किया क्योंकि वे जिस राज्य को सँभालने का दायित्व उठाने
वाले थे वे नहीं चाहते थे कि उस राज्य के नागरिक अपनी रानी पर विश्वास न कर पायें
क्योंकि जब एक राजा या प्रधानमंत्री अपने राज्य या राष्ट्र के नागरिकों का विश्वास
नहीं जीत पाता तो वह राज कभी प्रगति नहीं कर सकता , क्योंकि नागरिक जब राजा पर
अविश्वास करता है तो उसका मनोबल टूटता है और वह अपने राज्य,देश की प्रगति में आत्मविश्वास पूर्वक अपना शत प्रतिशत
कर्ताव्निष्ठ्ता और मेहनत के साथ कार्य पूर्ण नहीं कर सकता.भारतवर्ष में वर्तमान
में इस सूत्र को सच होते हुए तो आपने देखा ही है,एक ऐसा प्रधानमंत्री जिस पर
उसकी प्रजा को विश्वास ही नहीं था अपने देश की प्रगति में सहयोग ही नहीं कर पायी
जबकि किसी भी देश की प्रगति उसका राजा सीधे रूप से नहीं करता बल्कि उसकी प्रजा उस
राजा के नेतृत्व में करती है. राम ने उसी राज्य के भविष्य को देखते हुए मुझसे
अग्निपरीक्षा का आग्रह किया.....तब मेरा भी अपने राज्य के प्रति यही दायित्व था कि
मैं अपनी प्रजा के संदेह का कारण न बनूँ ताकि वह श्री राम और मुझ पर पूर्ण विश्वास
के साथ अयोध्या की प्रगति और उन्नति में सहायक हों. मैंने इसलिए अग्नि परीक्षा
देना स्वीकार किया और मैं निर्दोष थी तो क्यों नहीं अग्निपरीक्षा दे सकती थी,जिस प्रकार कभी दोषी का दोष सिद्ध करना पड़ता है उसे दंड देने के लिए,वैसे ही कभी कभी ऐसी परिस्थितियां बनती हैं कि निर्दोष को भी सिद्ध
करना होता है कि वह निर्दोष है ,तो यदि अग्निपरीक्षा से मेरे राज्य के निवासियों
के मन की शंकाएं मिटती तो मुझे क्या डर था ? मेरे आत्मसम्मान से कहीं
अधिक मेरे लिए मेरा राज्य था और मुझे मात्र एक महिला मान सिर्फ मेरे आत्मसम्मान के
लिए इतनि पीड़ा क्यों? आखिर आप भी तो ऐसा करके मुझे ही कमजोर मान रहे हैं
मैं पुरुषों के समकक्ष अपनी प्रजा के लिए एक त्याग (अपने झूठे आत्मसम्मान या
आत्म्दम्भ का ) क्यों नहीं कर सकती थी ? श्री राम ने मुझे अपने समकक्ष
माना और उन्होंने मुझसे अपेक्षा की कि मैं भी अपने राज्य को उनकी ही भांति
सर्वोपरि रखूंगी,निश्चित रूप से आप पूछेंगे उन्होंने क्या त्यागा? उन्होंने सत्ता त्यागी और उसके बदले कष्ट चुने सिर्फ पाने पिता के
वचन के लिए ही नहीं अपितु अपने राज्य के लिए क्योंकि जिस राज्य में सत्ता के लिए
क्लेश होता वह राज्य समाप्ति की ओर बढ़ता है. राम के त्याग के समकक्ष मैंने एक
त्याग किया क्योंकि मैं स्वयं को उनसे कम नहीं मानती थी. वे भी नहीं मानते थे.
सम्भवतः इसी उत्तर में उस प्रश्न का भी उत्तर मिलेगा जो श्री राम द्वारा मेरे त्याग
के विषय में पुछा जाता है.उत्तर वाही राज्य है राज्य एक सत्ताधारी राजा के लिए
सर्वोपरि होता है ये स्वार्थी और लोलुप व्यक्ति नहीं समझ पाते.मैंने भी श्री राम
से अलग होना स्वीकार किया क्योंकि तब भी मेरे लिए भी राज्य ही सर्वोपरि था. अब के
राजनयिकों से आप ऐसी अपेक्षा तो क्या कल्पना भी नहीं कर सकते तो क्या इससे मेरे या
श्री राम की नियत पर प्रश्नचिन्ह लगाने का अधिकार मिल गया आपको ?
और आज के कलयुगी रावण भक्त
न भूलें कि मेरी अग्नि परीक्षा ने न सिर्फ मुझे निर्दोष सिद्ध किया बल्कि उस रावण
को भी निर्दोष सिद्ध किया जो श्री राम का परम शत्रु था संभवतः ये श्री राम ही कर
सकते थे कि वे अपने शत्रु को युद्ध के मैदान में पराजित कर उसका वध तो कर सकते थे
परन्तु उसका चरित्र हनन होते नहीं देख सकते थे.
अब भी जिन कलुषित मन वाले
लोगों को मेरी अग्नि परीक्षा से ऐतराज है तो इसलिए कि वे एक स्त्री को इस लायक ही
नहीं समझते कि वह भी अपने राज्य के लिए पुरुषों के तरह मानसिक रूप से शक्तिशाली हो
सकती है , मेरा चरित्र नहीं बल्कि ऐसे पुरुषों की सोच
ही उस अग्निपरीक्षा की मोहताज थी जो प्रत्येक स्थिति में महिला को ही कमजोर मान कर
उस पर प्रश्नचिन्ह लगाते हैं.
मेरी तरह हर वह स्त्री जो
पुरुषों के समकक्ष खड़ी होने का साहस रखेगी उसके पास भी जब अग्निपरीक्षा या राज्य
में से प्रथम विकल्प चुनने का अवसर आएगा वह अग्निपरीक्षा का विकल्प पूरे गर्व से
चुनेगी और अपने राज्य और राष्ट्र को सर्वोच्च स्थान दे कर विश्व में प्रतिष्ठित
करेगी. तुम सबके विलाप से न मुझे फर्क पड़ा न आने वाली सीताओं को पड़ेगा.