पार्थ :- हे कृष्ण ! सब कहते हैं स्त्री को तुम भी नहीं समझते। तुम तो भगवान हो!
आखिर स्त्री क्या है?
कृष्ण:- पार्थ ! स्त्री को मैं भला कैसे नहीं समझूंगा ? मैनें तो देवकी को भी देखा है जिसने ममता के लिये मुझे त्याग दिया और मैनें यशोदा को भी देखा है जिसने ममता के प्रतिमान गढ़े !
मैनें राधा को भी देखा है जिसने बिना मुझसे कोई भी अधिकार चाहे मुझसे प्रेम किया और मैनें रुक्मिणी को भी देखा है जो प्रेमवश मुझ पर सम्पूर्ण अधिकार चाहती है।
कल युग मीरा को भी देखेगा जो मेरे पाषाणों के प्रतिरूप से भी ऐसे प्रेम करेगी कि मुझे उन पाषाणों से भी श्वास लेनी पड़ेगी।
अर्जुन :- तो स्त्री को समझना ईश्वर के भी वश में नहीं,ऐसा क्यों कहते हैं लोग?
कृष्ण :- अपने हर अपराध और पाप के ठीकरे मनुष्य सदा ईश्वर पर ही तो फोड़ता है। स्त्री को ही क्या वह तो स्वयं को भी नहीं समझ पाता है।
एक पुरुष जिस दिन स्वयं को समझ लेगा,स्त्री उसके लिए कोई कठिन समीकरण नहीं रहेगी पार्थ !
स्त्री अपने पुरुष का गुणनखण्ड होती है। वह पुरुष को सरल बनाने को विभक्त होती है पर पुरुष जब उससे वापस गुणनफल नहीं प्राप्त कर पाता तो वह उसे समझना असंभव मान लेता है।
स्त्री अपने पुरुष सी ही होती है।
तुम्हें सिर्फ उसका पुरुष बन जाना है।
वह तुम्हारा गुणनखण्ड हो कर तुममें समा जाएगी।
#काल्पनिक_वार्तालाप
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