चारों तरफ निगाह डालिए तो हर जगह बस क्रंदन और विलाप सुनाई देता है,
स्त्रियाँ दुखी हैं कि उन्हें पुरुष
सत्तात्मक समाज के बंधन में रखा जाता है ,‘निम्न’ जाति के लोग दुखी हैं कि ‘उच्च’
जाति के लोगों ने उनके ऊपर पीढ़ी दर पीढ़ी अत्याचार किया , मजदूर दुखी हैं कि उनके
काम का यथायोग्य अर्थ उन्हें नहीं मिलता , कर्मचारी दुखी हैं कि उनका अधिकारी उनका
शोषण करता है , आम जन दुखी हैं कि सरकार और नेता उनके हित में काम नहीं करते.मरीज
चिकित्सकों से दुखी हैं तो वादी प्रतिवादी वकीलों से , तात्पर्य यह कि हमारे चारों
तरफ दो तरह के वर्ग हैं एक शोषित और दूसरा
शोषक. मतलब जो भी शक्तिशाली है वह अपने से कम शक्ति रखने वाले पर शक्ति
प्रदर्शन करता है. क्यों सब दुखी तो हैं पर समस्या या दुःख का समाधान नहीं किसी के
पास ? शोषित वर्ग अधिकार तो मांगता है पर क्यों उस अधिकार को पाने के लिए आवश्यक
कर्म नहीं करता ? और इसीलिए शोषित हमेशा शोषित ही रहता है.
हर बड़ी मछली छोटी मछली को निगलने का प्रयास करती है , जंगल में सभी
जानवर अपने से कम शक्तिशाली जानवर का शिकार करके अपना अस्तित्व बचाना चाहते
हैं.शक्तिशाली ही अपना अस्तित्व बचा पाते हैं यही संसार का सत्य भी है और नियम भी
.जिस तरह हर जानवर शाकाहारी नहीं होता वैसे ही हर मानव जन्म लेने वाला भी सात्विक
नहीं हो सकता.
शोषित वर्ग शोषित होता है इसमें जितना अपराध शोषकों का है क्या उतना
ही शोषितों का शोषण को अपनी नियति मान लेने की मानसिकता का नहीं ? नारियां पुरुषों
के अधीन उनके बनाये नियमों को मानने के लिए बाध्य थीं क्योंकि उन्होंने मान लिया
कि वे पुरुषों पर आश्रित हैं और रहेंगी इसलिए उन्होंने वे नियम माने जिन्होंने उन
नियमों को मानने से इंकार किया उनका विरोध दूसरी नारियों ने ही किया,उन्हें समझाया
कि वे अकेले अस्तित्वहीन हो जाएँगी. वरना स्त्री जो घर गृहस्थी में दक्ष हो,बच्चे
जन्म दे कर पाल पोस सके जिसे शिव ने शक्ति के रूप में स्वीकार किया उसे स्वयं को
शक्तिहीन मान लेने की क्या आवश्यकता थी ? उच्च जाति के मुट्ठी भर लोगों ने निम्न
जाति पर अपने नियम थोपे तो निम्न जाति के लोगों ने एक आवाज में मानने से इन्कार
क्यों नहीं कर दिया ? निम्न जाति प्रताड़ित हुई क्योंकि उसने स्वयं को शक्ति विहीन
मान कर शक्ति को उच्च जातियों का दास मान लिया. फिर भला शक्ति प्रदर्शन किसी को बुरा
क्यों लगे? श्रेष्ठ होने की भावना गर्व तो साथ में लाएगी ही,ये तो स्वाभाविक ही
है. क्या स्थितियां बदल नहीं जातीं यदि नारियों ने और निम्न जाति ने स्वयं की
श्रेष्ठता को कम नहीं आँका होता. ब्राह्मणों ने स्वयं को शिक्षा के द्वारा,क्षत्रियों
ने स्वयं को शस्त्रों के द्वारा,वैश्यों ने व्यापार के माध्यम से स्वयं को श्रेष्ठ
सिद्ध किया तो शेष जातियां भी अपने कार्य की महत्ता और उसकी श्रेष्ठता सिद्ध कर
सकती थी पर उन्होंने स्वयं ही स्वयं को शक्तिहीन मान लिया और दूसरी जातियों को
उच्च स्वीकार कर लिया. फिर रोना बिसूरना क्यों ? वह प्रत्येक वर्ग या समूह शोषित
होता है जो स्वयं ही शोषित होने के लिए तैयार हो जाता है जो नहीं होता उसे कोई
शक्ति शोषित नहीं कर सकती.
अब भी समय है हम अपने कार्य क्षेत्र में,अपने रीति रिवाजों में,अपने
धर्म शास्त्रों में अपने आचार विचार और व्यवहार में स्वयं को श्रेष्ठ सिद्ध करें
और शोषित होना छोड़ें,रोना बिसूरना छोड़ें,शक्ति अर्जन करने के उपाय खोजें और उन पर
कार्य करें.प्रत्येक शोषित समूह पहले स्वयं को शक्ति हीन मानने से इनकार करे.
पर यह ध्यान रखा जाना चाहिए की शक्ति अर्जन स्वयं करना पड़ता है वह
किसी दूसरे को शक्तिहीन करने मात्र से नहीं मिलेगी. प्रत्येक शोषित वर्ग यदि शोषण
करने वाले को शोषित करने का स्वप्न देखेगा तो वह शक्ति अर्जन करने का प्रयास असफल
ही रहेगा क्योंकि तब वह मात्र प्रतिशोध में बदल जायेगा.
हम सभी जो शोषित होते हैं अपनी शक्ति समेत के अपने को श्रेष्ठ बनाने
और फिर उस श्रेष्ठता को सिद्ध करने का प्रयास करें और समाज में संतुलन स्थापित
करें और आक्षेप लगाना छोड़ के शक्ति के सापेक्ष हों. आरोप लगाना बंद करें और प्रयास
करना आरम्भ करें. आइये शक्तिमान बनें.
3 comments:
bahut umdaaaaaaa
bahut umdaaaaaaa
धन्यवाद :)
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