Wednesday, 21 March 2018

मैं तुम्हारे ही लिए

तुम जब भी कुम्हलाओगे
मैं जल सी शीतलता लाऊंगी
पीड़ा में होगे जब भी तुम
औषधि बन कर आऊँगी

पर मेरा प्रेम परखने को तुम
जान कर मत कुम्हला जाना
मेरी परीक्षा लेने को ही बस
जानी बूझी पीड़ा मत ले आना

प्रेम वही,जो असीमित हो जाये
प्रेमियों की परन्तु,निश्चित सीमाएं हैं
स्नेह वही,जो अनंत हो जाये
नेह-प्रदर्शन की पर,निश्चित गणनाएं हैं

तुम मेरे अपराध क्षमा कर देना
तुम्हारी भूलें मैं भूल जाऊँगी
मेरे पग भटकें तो तुम दिशा दिखा देना
तुमको पथरीले रस्तों से मैं वापस ले आऊँगी

Wednesday, 14 March 2018

माँ हो जाने का अर्थ

पहला गर्भधारण!
अलौकिक अनुभव!!
थोड़ी सी असुविधाएं और ढेर सी चिन्ताएं!

विवाह के एक वर्ष के पश्चात जब ये समय मेरे जीवन में आया तो मेरे पास प्रतिक्रिया देने के लिये शब्द तो दूर भावों की भी बहुत कमी थी।

लगा जैसे मैं स्वयं ब्रह्मा हो गयी हूँ,सृष्टि रचूंगी अब!

लगा,विष्णु भी मैं ही हूँ,मेरा बच्चा मेरे शरीर से पलेगा!
मैं गर्व से सराबोर थी!

ईश्वर से कहती,"देखो मैं तो आप सी हो गयी हूँ।बस अपने बच्चे का लिंग निर्धारण नहीं कर सकती अन्यथा अपनी प्रथम संतान के रूप में बेटी स्वयं निर्मित कर लेती।आप कर सकते हो तो मुझे बेटी देना pleeeeeeeeezzzzz"

इन्हीं सब चिंताओं और मनःस्थिति के बीच मेरा गर्भकाल आगे बढ़ रहा था।
प्रथम बार एक महिला किन किन चिंताओं से गुजरती है मायें जानती ही होंगी।संभवतः पिता भी अवश्य जानते होंगे।

बच्चा स्वस्थ हो,हाथ पैर,नाक कान आदि ठीक ठाक हों जैसे विचार तो पीछा छोड़ते ही नहीं।

ऊपर से मेरे सारे शरीर में खुजली की समस्या....मुझे स्वयं पर तो लज्जा आती ही,ये भी लगता कि कि अंदर बच्चे को कुछ होगा तो नहीं...
और प्रथम गर्भधारण में मेरा तो पेट भी बाकी महिलाओं की तरह बहुत बड़ा नहीं हुआ।
मैं हर समय चिंता में रहती,डॉ की जान खाती "डॉ mam,अंदर बढ़ तो रहा है ना बच्चा?" डॉ मुस्कुरा कर कहतीं निश्चिंत रहो! कान्हा सब ठीक करेंगे।

ऐसी मनोदशा में मैं जब टेम्पो,रिक्शा आदि में यात्रा करती तो मुलायम सिंह यादव के दौर की सड़कें मेरे आगे किसी पूतना से कम नहीं होतीं।
मैं डरते डरते रिक्शा,टेम्पो में बैठती तो चालक से विनती करती कि "भईया धीरे चलाना"

और आपको एक बात मैं दावे से कह सकती हूँ कि सड़क पर चलने वाले लगभग सभी पुरुष एक गर्भवती स्त्री का भाई होने का दायित्व स्वतः निभाते हैं।

टेम्पो स्टैंड पर अपने नंबर के लिए हड़बड़ी में रहने वाले,लाठी डंडों तक तुरंत उतरने वाले लड़ाके टेम्पो चालक मुझे देखते ही मेरे अभिभावक की भूमिका में आ जाते और मुलायम काल की सड़क का हर गड्ढा बचाने का प्रयास करते।यदि असफल हो भी जाते तो सहचालक चिल्लाता "$%%के!पीछे का ध्यान रख!धीरे चला बे!" मैं हँस देती!सोचती कि यदि मैं ब्रह्मा और विष्णु हूँ तो ये कौन से भोले भंडारी से कम हैं!

जब उतरने की बारी आती तो सहचालक ध्यान से मुझे उतारते, मेरी तरफ निश्छल मुस्कान देते।

और मैनें यही टेम्पो चालक और सहचालक लड़कियों को छेड़ते,उनसे बदतमीजी करते और उनकी हँसी भी करते देखे हैं।

यही तो सम्बन्ध है पुरुष और स्त्री के बीच!जैसे ही स्त्री सुरक्षा माँगती है पुरुष सुरक्षा प्रहरी बनने में देर नहीं करते।पर स्त्री बराबरी मांगे तो उनका अहम घायल होता है।

इस तरह तमाम सुखद अनुभवों के साथ वह समय आया जब मैं माँ बनी और ईश्वर मेरे स्वयं को ईश्वर समझने के गर्वोन्मत व्यवहार से क्रोधित नहीं हुआ और मुझे क्षमा करते हुए  मुझे बेटी  का अनमोल उपहार दिया!

बिटिया लगभग सात महीने की थी तब मैनें नौकरी के लिये आवेदन किया था,मूल निवास प्रमाण पत्र कचहरी परिसर में बनना था,पहली बार पूरा दिन मैं बेटी को ले के घर से बाहर थी।दिन में कई बार दूध पिलाना था।कचहरी में वकील,अपराधी और पुलिस वाले..... सभी के बारे में हम पूर्वाग्रह से ग्रसित होते हैं पर मजाल थी कि किसी ने मुझे दूध पिलाते देखने में कोई रुचि दिखाई हो!बल्कि एक वकील साहब ने मुझे अपने छोटे से बस्ते में बैठने के लिए कहा और बोले "सिर्फ एक माँ ही अपने बच्चे का ऐसा ध्यान रख सकती है" मैं आपकी जगह होता तो बच्चे की जगह खुद रो रहा होता।

ऐसे पुरुष क्या प्रताड़ना के योग्य हैं?

माँ बनने का प्रथम चरण संभवतः वासना ही है परंतु एक महिला जब माँ बनती है तो वह वासना से मुक्त हो जाती है,स्तनपान हो या बच्चे को संभालने में असावधानी वश अस्त व्यस्त होना,माँ के दिल और दिमाग में वासना या अन्य पुरुष हो ही नहीं सकता और यही माँ होने की सफलता है।और जब तक एक शिशु के पालन पोषण की अवधि में माँ वासना मुक्त रहती है,कोई सामान्य पुरुष उस पर दृष्टिपात नहीं करता।

और यदि एक माँ अपने शिशु के पालन पोषण के समय वासना मुक्त नहीं है और उसे अन्य पुरुषों के घूरने का खयाल आ रहा है तो उसे गुप्त रोग वाले हकीम जी से मिल लेना चाहिये।

निष्पक्षता/निरपेक्षता बनाम पक्ष/धर्मनिष्ठा

एक बार पार्वती जी धरा भ्रमण पर निकलीं।

उन्होंने धरा पर प्रसन्न चित्त महिलाएं और पुरुष देखे।स्त्रियां पुरुषों के साथ मिलकर कृषि से लेकर परिवार के पालन पोषण में सम अधिकार से भाग ले रही थीं और जीतोड़ मेहनत में भी प्रसन्न हो कर संगीत,नृत्य में डूबे हुए इतने मगन थे कि जैसे दुख,दरिद्रता उनसे हारी हुई थी।

पार्वती जी ये सब देख कर अत्यंत प्रसन्न हुईं।

थोड़ा आगे बढ़ीं तो देखती हैं कि किन्नरों का एक दल बैठा हुआ था।सभी किन्नर विचार कर रहे थे कि कब किसके यहां विवाह समारोह या बच्चा पैदा हो तो उन्हें भी उत्सव और धन प्राप्ति का अवसर मिले।

पार्वती जी उन्हें देख कर दुखी हुईं कि ये बेचारे प्रसन्नता के लिये अन्य पर निर्भर हैं जबकि पुरुष और स्त्रियों को ऐसी प्रतीक्षा नहीं करनी पड़ती।

पार्वती जी शिव जी के पास पहुँची और किन्नरों की इस समस्या को सुलझाने के लिये विनती की।
शिव जी ने उन्हें समझाया कि ये विधि का विधान है।किन्नरों के ये भाग्य है और उन्हें इसे स्वीकार करना होगा।

पर वह पत्नी ही क्या जो पति को अपने समक्ष नतमस्तक न कर सके।पार्वती जी की अश्रुधारा बह निकली।पार्वती जी के अश्रु देख शिव जी विचलित हो गए।अंततः उन्होंने अन्य पतियों की भांति अपने शस्त्र पार्वती जी के सम्मुख डाल दिये और बोले "जाओ प्रिये!कल प्रातः किन्नरों को ले कर आना, मैं उनकी समस्या का समाधान करूँगा"

पार्वती जी प्रसन्न हो किन्नरों के पास दौड़ी गयीं और उनसे कहा कि कल शिव जी तुम्हारी समस्याओं का अंत कर देंगे।

किन्नर भी अत्यंत प्रसन्न हुए।आपस में विचार विमर्श करके वे अगली भोर शिव जी के पास पहुँचे।

शिव जी ने मुस्कुराते हुए उनसे कहा "हे किन्नरों!मेरी प्रिये आपको देख के अत्यंत दुःख में हैं और मुझसे उनका दुख देखा नहीं जाता अतः आप अपने लिये स्वयं ही महिला या पुरुष होना चुन लीजिये।"

ये कहते हुए शिव जी ने  अपने पारेन्द्रिय ज्ञान से ब्रह्मा जी और विष्णु जी से संपर्क कर कहा कि "हे देवों!कुछ ऐसा कीजिये कि मेरी पार्वती की इच्छा का सम्मान भी रह जाये और विधि के विधान पर भी आँच न आये।"

दुखी पति का दुख एक पति ही समझ सकता है।ब्रह्मा जी और विष्णु जी ने गहन चर्चा के पश्चात समस्या का समाधान खोजा और शिव जी को कहा कि वे किन्नरों को चाहे पुरुष बनाएं या महिला बस वरदान देते समय आगे निष्पक्ष लगा दें।

अर्थात् जो किन्नर पुरुष बनना चाहे उसे वरदान दें कि "वत्स! तुम निष्पक्ष पुरुष बनो!"
ठीक यही महिला के लिये भी करें!

शिव जी की सभी शंकाएं मिट गयीं।

यहाँ यह बताना भी आवश्यक है कि कुछ किन्नरों ने एक ही जन्म में अपने अपने कष्टों से मुक्ति के लिये किन्नर रहना स्वीकार किया।

और जो किन्नर महिला अथवा पुरुष बने वे कालांतर में निष्पक्ष कहलाये।

इक्कीसवीं सदी में बुद्धिमान पुरुष/महिलाएं भक्त हुए और मूर्ख पुरुष/महिलाएं चमचे हुए।

और वे किन्नर जो अपनी पसंद से महिला/पुरुष हुए,वे निष्पक्ष हुये।

आज भी ये निष्पक्ष किन्नर स्वयं को किसी पक्ष के अनुरूप नहीं पाते और तड़पते हुए कभी इधर और कभी उधर लुढ़कते से रहते हैं।

और अपनी निष्पक्षता की पीड़ा वे गर्व के अभिनय से छुपाते हैं कि "जी,हम तो निष्पक्ष हैं"

और ऐसे निष्पक्ष आज भी झुंड बना कर NDTV, JNU आदि स्थानों पर तालियाँ बजा कर विधि के विधान का मान रख रहे हैं।

Thursday, 8 March 2018

पूरक

स्त्रियों सी नदियाँ कहीं रुकती नहीं,
सदा बहती रहती हैं
सभ्यताओं का लालन पालन करती हैं
प्यास बुझातीं,ग्राम-नगर बसाती जातीं
मानवता पर इठलातीं,जीवों की माँ हो जाती हैं

ये नदियां हैं..........

पुरुषों से पर्वत सदा अचल,अटल,अविचल रहते हैं
मानव का पथ रोकते से प्रतीत होते
धरती की छाती पर बोझ से लगते
पर नदियों के जन्मदाता यही तो हैं

स्त्री सी नदियों के बिना जीवन नहीं और
पुरुषों से पर्वतों के बिना नदियां नहीं

पथ में स्थिर हों तो मृत्यु को प्राप्त हों
सागर-लक्ष्य को प्राप्त हों तो पूर्ण हो जाती हैं
मिठास छोड़ कर नमक हो जाती हैं
क्योंकि जानती हैं वे सागर से ही हैं
सागर बादल देता है,बादल वर्षा लाते हैं
वर्षा ही तो नदियों को यौवन देती हैं

पर्वत नदियों के पिता हैं,सागर साजन है
इन दोनों के बिना नदियाँ नहीं होतीं
वैसे ही जैसे पुरुषों के बिना स्त्रियां नहीं होतीं
और स्त्रियों के बिना जीवन नहीं होता
😊