Wednesday, 14 March 2018

निष्पक्षता/निरपेक्षता बनाम पक्ष/धर्मनिष्ठा

एक बार पार्वती जी धरा भ्रमण पर निकलीं।

उन्होंने धरा पर प्रसन्न चित्त महिलाएं और पुरुष देखे।स्त्रियां पुरुषों के साथ मिलकर कृषि से लेकर परिवार के पालन पोषण में सम अधिकार से भाग ले रही थीं और जीतोड़ मेहनत में भी प्रसन्न हो कर संगीत,नृत्य में डूबे हुए इतने मगन थे कि जैसे दुख,दरिद्रता उनसे हारी हुई थी।

पार्वती जी ये सब देख कर अत्यंत प्रसन्न हुईं।

थोड़ा आगे बढ़ीं तो देखती हैं कि किन्नरों का एक दल बैठा हुआ था।सभी किन्नर विचार कर रहे थे कि कब किसके यहां विवाह समारोह या बच्चा पैदा हो तो उन्हें भी उत्सव और धन प्राप्ति का अवसर मिले।

पार्वती जी उन्हें देख कर दुखी हुईं कि ये बेचारे प्रसन्नता के लिये अन्य पर निर्भर हैं जबकि पुरुष और स्त्रियों को ऐसी प्रतीक्षा नहीं करनी पड़ती।

पार्वती जी शिव जी के पास पहुँची और किन्नरों की इस समस्या को सुलझाने के लिये विनती की।
शिव जी ने उन्हें समझाया कि ये विधि का विधान है।किन्नरों के ये भाग्य है और उन्हें इसे स्वीकार करना होगा।

पर वह पत्नी ही क्या जो पति को अपने समक्ष नतमस्तक न कर सके।पार्वती जी की अश्रुधारा बह निकली।पार्वती जी के अश्रु देख शिव जी विचलित हो गए।अंततः उन्होंने अन्य पतियों की भांति अपने शस्त्र पार्वती जी के सम्मुख डाल दिये और बोले "जाओ प्रिये!कल प्रातः किन्नरों को ले कर आना, मैं उनकी समस्या का समाधान करूँगा"

पार्वती जी प्रसन्न हो किन्नरों के पास दौड़ी गयीं और उनसे कहा कि कल शिव जी तुम्हारी समस्याओं का अंत कर देंगे।

किन्नर भी अत्यंत प्रसन्न हुए।आपस में विचार विमर्श करके वे अगली भोर शिव जी के पास पहुँचे।

शिव जी ने मुस्कुराते हुए उनसे कहा "हे किन्नरों!मेरी प्रिये आपको देख के अत्यंत दुःख में हैं और मुझसे उनका दुख देखा नहीं जाता अतः आप अपने लिये स्वयं ही महिला या पुरुष होना चुन लीजिये।"

ये कहते हुए शिव जी ने  अपने पारेन्द्रिय ज्ञान से ब्रह्मा जी और विष्णु जी से संपर्क कर कहा कि "हे देवों!कुछ ऐसा कीजिये कि मेरी पार्वती की इच्छा का सम्मान भी रह जाये और विधि के विधान पर भी आँच न आये।"

दुखी पति का दुख एक पति ही समझ सकता है।ब्रह्मा जी और विष्णु जी ने गहन चर्चा के पश्चात समस्या का समाधान खोजा और शिव जी को कहा कि वे किन्नरों को चाहे पुरुष बनाएं या महिला बस वरदान देते समय आगे निष्पक्ष लगा दें।

अर्थात् जो किन्नर पुरुष बनना चाहे उसे वरदान दें कि "वत्स! तुम निष्पक्ष पुरुष बनो!"
ठीक यही महिला के लिये भी करें!

शिव जी की सभी शंकाएं मिट गयीं।

यहाँ यह बताना भी आवश्यक है कि कुछ किन्नरों ने एक ही जन्म में अपने अपने कष्टों से मुक्ति के लिये किन्नर रहना स्वीकार किया।

और जो किन्नर महिला अथवा पुरुष बने वे कालांतर में निष्पक्ष कहलाये।

इक्कीसवीं सदी में बुद्धिमान पुरुष/महिलाएं भक्त हुए और मूर्ख पुरुष/महिलाएं चमचे हुए।

और वे किन्नर जो अपनी पसंद से महिला/पुरुष हुए,वे निष्पक्ष हुये।

आज भी ये निष्पक्ष किन्नर स्वयं को किसी पक्ष के अनुरूप नहीं पाते और तड़पते हुए कभी इधर और कभी उधर लुढ़कते से रहते हैं।

और अपनी निष्पक्षता की पीड़ा वे गर्व के अभिनय से छुपाते हैं कि "जी,हम तो निष्पक्ष हैं"

और ऐसे निष्पक्ष आज भी झुंड बना कर NDTV, JNU आदि स्थानों पर तालियाँ बजा कर विधि के विधान का मान रख रहे हैं।

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